How TN Sheshan clashed with Lalu prasad yadav jyoti basu VP singh narsimha rao | लालू प्रसाद और ज्योति बसु से लेकर वीपी सिंह तक… टीएन शेषण ने सबकी ऐसी की तैसी कर दी!

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शेषन 1990 से 1996 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे और अपने कार्यकाल में बिहार के सीएम लालू प्रसाद, बंगाल के सीएम ज्योति बसु से लेकर प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव तक किसी को नहीं बख्शा.

लालू प्रसाद और ज्योति बसु से लेकर वीपी सिंह तक... टीएन शेषण ने सबकी ऐसी की तैसी कर दी!

टीएन शेषण

Image Credit source: File Photo

बिहार में उन दिनों ‘लालू’ का दौर था. लालू प्रसाद यादव का. चुनाव में बूथ कैप्चरिंग जैसी खबरें आम थीं. ऐसे में एक चुनाव आयुक्त हुए- टीएन शेषण. 1995 विधानसभा चुनाव की बात है. शेषण ने मतदान की तारीखों में फेरबदल करते हुए चरणबद्ध चुनाव का फैसला लिया. 90 के दशक में यह नया कदम था. सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद और प्रशासनिक तैयारियां भी दुरुस्त. पूरी मॉनिटरिंग के साथ.

हेलिकॉप्टर की गड़-गड़ आवाज उन दिनों बढ़ गई थी. सत्ताधारी राजद को जैसी उम्मीद थी, वैसा नहीं हो रहा था. बिहार के लोग भी ऐसा अनुभव शायद पहली बार महसूस करनेवाले थे. शेषण के सख्ती भरे कदमों से लालू प्रसाद नाराज थे. बोले-


ई शेषनवा चुनाव करवा रहा है या कुंभ?


शेषण की निगरानी में चुनाव हुए. हालांकि जनता दल 167 सीट जीतकर बहुमत ले आई. लालू फिर से सीएम बने. लेकिन उनका वोट परसेंटेज घटा. शेषण की सख्ती का असर था कि बिहार में 61.79 फीसदी वोटिंग हुई, लेकिन रिजेक्टेड वोटों की संख्या 5,65,851 (1990) से लगभग दोगुना हो कर 11,25,854 (1995) हो गई. शेषण ने 4 चरणों में चुनाव करवाए थे और चारों बार तारीखों में बदलाव किया. बिहार के इतिहास में वह सबसे लंबी चली वोटिंग थी. छोटी-मोटी घटनाओं को छोड़ दिया जाए तो गड़बड़झाले नहीं हुए.

सबसे लिया पंगा

शेषन 1990 से 1996 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे और अपने कार्यकाल में हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल गुलशेर अहमद, बिहार के सीएम लालू प्रसाद, बंगाल के सीएम ज्योति बसु से लेकर प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव तक किसी को नहीं बख्शा. वे ऐसे चुनाव आयुक्त थे, जो कहते थे कि मैं नेताओं को नाश्ते में खाता हूं. राजीव गांधी की हत्या के बाद उन्होंने तत्कालीन सरकार से बिना पूछे लोकसभा चुनाव स्थगित करा दिया था.

अक्टूबर 1993 में, पीवी नरसिम्हा राव की सरकार ने चुनाव आयोग में दो सहायक आयुक्तों को नियुक्त कर चुनाव आयोग को बहु-सदस्यीय संस्था में बदल दिया. हालांकि शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त ही रहे पर उनकी शक्तियां कुछ कम हो गईं. शेषन ने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट से भी हस्तक्षेप का आग्रह किया पर फैसला सरकार के पक्ष में गया. शेषण दूसरी लड़ाई के लिए तैयार थे.

फोटो पहचान पत्र के लिए लड़ाई

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के नियम 37 के तहत आयोग को चुनाव आगे बढ़ाए जाने या नहीं भी कराए जाने तक का अधिकार है. बोगस वोटिंग और फर्जी मतदाताओं पर लगाम लगाने के लिए शेषण फोटो वाली वोटर आईडी लाना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने नियम 37 की चेतावनी दी. वे अड़े थे कि सरकार फोटो सहित वोटर आईडी लाने में देर करेगी तो वे नियम 37 का प्रयोग करेंगे.

ऐसे में राज्य और केंद्र, दोनों सरकारों के साथ गतिरोध की स्थिति पैदा हो गई. पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इसकी तुलना ‘लोकतांत्रिक गतिरोध’ से की, जबकि पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने तो शेषन को ‘पागल कुत्ता’ तक कह डाला. शेषन न्यायिक हस्तक्षेप के बाद ही माने. फोटो वाले मतदाता पहचान पत्र का वास्तविकता बन जाना उनके दृढ़ निश्चय का ही प्रतिफल था.

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